Devayani, Yayati और Sharmishtha – भाग 7 (अंतिम)

राजा ययाति ने अपने पुत्र पुरु को राज्य सौंपकर वन का आश्रय लिया। वहाँ उन्होंने कठोर तपस्या आरम्भ की। वे फल और मूल खाकर जीवन व्यतीत करते, इन्द्रियों को वश में रखते और यज्ञ, हवन तथा अतिथियों की सेवा में लगे रहते।

उन्होंने दीर्घ काल तक तपस्या की। कभी वे वायु का ही सेवन करते, कभी एक पैर पर खड़े रहते, कभी अग्नि के बीच तप करते। इस प्रकार उन्होंने महान तप अर्जित किया।

उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर देवताओं ने उन्हें स्वर्ग लोक में स्थान दिया। वहाँ वे देवताओं, ऋषियों और गन्धर्वों के बीच सम्मानित हुए।

ययाति स्वर्ग में दीर्घ काल तक रहे और अनेक दिव्य लोकों का अनुभव किया। वे इन्द्र के समीप भी जाते थे और देवताओं के साथ निवास करते थे।

एक दिन इन्द्र ने ययाति से पूछा — “हे राजन्, जब आपने अपने पुत्र पुरु को राज्य दिया, तब आपने उसे क्या उपदेश दिया था?”

ययाति ने उत्तर दिया — “मैंने उसे सिखाया कि क्रोध पर विजय प्राप्त करनी चाहिए। जो व्यक्ति अपमान सहकर भी शांत रहता है, वही श्रेष्ठ है।”

“कटु वचन कभी नहीं बोलने चाहिए, क्योंकि वे हृदय को घायल कर देते हैं। सदैव मधुर वाणी का प्रयोग करना चाहिए।”

“दया, दान, मित्रता और सत्य ही मनुष्य के सबसे बड़े धर्म हैं।”

इन्द्र ने पुनः पूछा — “हे ययाति, तपस्या में तुम अपने समान किसे मानते हो?”

ययाति ने उत्तर दिया — “मैं अपने समान किसी को नहीं देखता।”

यह सुनकर इन्द्र ने कहा — “तुम्हारे भीतर अहंकार उत्पन्न हो गया है। इसलिए तुम्हारा पुण्य क्षीण हो जाएगा और तुम्हें स्वर्ग से गिरना पड़ेगा।”

यह सुनकर ययाति ने कहा — “यदि मुझे गिरना ही है, तो मैं सज्जनों के बीच ही गिरूँ।”

तत्पश्चात् ययाति स्वर्ग से गिरने लगे। गिरते समय उन्होंने महान ऋषि अश्टक को देखा, जिन्होंने उनसे प्रश्न किया — “हे तेजस्वी पुरुष, आप कौन हैं?”

ययाति ने उत्तर दिया — “मैं नहुष का पुत्र ययाति हूँ। अपने अहंकार के कारण मैं स्वर्ग से पतित हो रहा हूँ।”

ऋषियों ने उनसे धर्म, जीवन और पुनर्जन्म के विषय में अनेक प्रश्न किए। ययाति ने विस्तार से उत्तर दिए —

“मनुष्य अपने कर्मों के अनुसार पुनर्जन्म प्राप्त करता है। पुण्य करने वाले उच्च लोकों में जाते हैं और पाप करने वाले निम्न योनियों में जन्म लेते हैं।”

“अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। यह उसके सभी पुण्यों को नष्ट कर देता है।”

“सत्य, दया, संयम और ज्ञान ही मोक्ष के मार्ग हैं।”

ऋषि अश्टक और अन्य राजर्षियों ने ययाति को अपने पुण्य प्रदान करने की इच्छा व्यक्त की, परन्तु ययाति ने उसे स्वीकार नहीं किया।

उन्होंने कहा — “मैंने जीवन भर दान दिया है, इसलिए अब मैं किसी से दान नहीं लूँगा।”

ऋषियों ने उनकी महानता को समझा और अंततः सभी ने मिलकर स्वर्ग की ओर प्रस्थान किया।

ययाति पुनः स्वर्ग को प्राप्त हुए और अपने पुण्य तथा ज्ञान के कारण अमर कीर्ति प्राप्त की।

इस प्रकार ययाति की कथा हमें यह शिक्षा देती है कि —

  • इच्छाओं का अंत नहीं होता
  • अहंकार पतन का कारण है
  • सत्य और धर्म ही जीवन का आधार हैं
  • कर्तव्य पालन करने वाला ही सच्चा पुत्र होता है

यही ययाति की महान कथा का समापन है।